सुभाष चंद्रा बोस पर निबंध हिंदी में – पढे यहाँ Subhash Chandra Bose Essay In hindi

प्रस्त्वाना :

जब भारत देश अंग्रेजो की गुलामी की चपेट में था | और जब उनपर क्रूरता के हद को पार कर उन पर अत्याचार करने लगे |तब भारत के कुछ भारतीय स्वतंत्रता सैनानियों ने अपने देश के आजादी हेतु अपने प्राणो की आहुति देने के लिए आगे आये, जिनमे से एक स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस भी थे|

हालाँकि जो पुरुष वीर होते हैं, वे केवल एक बार ही मरते है किन्तु उनके अस्तित्व और उनके यश और उनके नाम को नहीं मिटा पाती और यही कारण है की वे अमर हो जाते है |

भारत देश के स्वतंत्रता के लिए सुभाष चन्द्र बोस ने जिस मार्ग को अपनाया था शायद ही कोई अपनाता और इसी लिए सुभाष चन्द्र बोस का नाम अग्रणीय है |

सुभाष चन्द्र बोस की शिक्षा 

सुभाष चन्द्र बोस जी को अध्यन करने का बचपन से ही रूचि थी | उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक के एक बहुत जी मना जाना विद्यालय रेवेंश्वा कालेजिएट स्कूल में से प्राप्त की थी|

मट्रिक की परीक्षा को पास करते ही उन्होंने कोलकाता से प्रेसिडेंस कालेज से प्रथम श्रेणी प्राप्त किये |

सुभाष जी सन १९१५ में बीमार होने के बावजूद १२वी की परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किये | कुल विषयों की अपेक्षा उनकी अंग्रेजी विषय में काफी अच्छे अंक मिले थे |

जिससे परीक्षक अध्यापक को विवश होकर यह कहना पढ़ा गया की “ तुमसे अच्छी अंग्रेजी तो मै भी  नहीं लिख पाउँगा”|

सुभाष चन्द्र बोस जी का जन्म 

सुभाष जी का जन्म २३-जनवरी-१८९७ को उड़ीसा राज्य के कटक में हुआ था | और इनके माता-पिता का नाम प्रभावती बोस और जानकीनाथ बोस था |

सुभाष जी के पिता एक वकील के पद पद पर कार्यरत थे जो की बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष  के पद पर भी रह चुके थे |

सुभाष जी को लोग प्रेम से नेता जी के नाम से भी पुकारते थे | वे अपने माता पिता के नौवे संतान थे, और उनके कुल १४ भाई-बहन थे |

सुभाष चन्द्र बोस जी का जीवन 

सुभाष चन्द्र बोस एक क्रांति कारी नेता थे | और उनकी मुलाकात सुरेश बाबू से हुआ जो की प्रेसिडेंट कालेज में हुआ था | और ये देश की सेवा हितु एक योजना के तहत संगठन भी बना रहे थें |

अपने देश के साथ अंग्रेजो का क्रूर व्यवहार देखते हुए, उन्होंने भी इस संगठन में भागीदारी लेने की ठान ली | और कठोर प्रतिज्ञा ली की अब मुझे आराम और ठाट की जीवन नहीं व्यतीत करना है बल्कि मुझे अपने देश को गुलामी से मुक्त करना है |

अतः यह सब जब उनके माता-पिता को पता चला तो उन्होंने सुभाषजी को कई तर्कों और उदाहरणों से समझाया की यह तुम्हारा कर्त्तव्य नहीं है किन्तु इस बात को न मानते हुए वे अपने फैसले पर अटल हो गये|

और देश की आजादी हेतु लोगो से यह आवाहन करने लगे की “तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आजादी दूंगा” और उन्होंने सन १९२० में गाँधी जी के साथ उनके द्वारा किये गये आन्दोलन में सहायता करते हुए देश को आजाद करने में लग गये |

निष्कर्ष :

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एक ऐसे नेता थे ,जिन्होंने कभी झुकना नहीं सिखा| और इससे हमें प्रेरणा लेना चाहिये |

Updated: February 22, 2019 — 10:31 am

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